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Friday, September 18, 2009

मेरी कुछ कवितायें

1
आत्मज दुख
होते होंगे किसी कोटर में
लौटने के लिए आतुर
सुनो
थोड़ा पहाड़ होने दो
ढलान पर
बनने दो पेड़
किसी उरोज पर
तय होगा
शब्दों का अवसान
कोई रात को
लिखे भी तो कैसे
प्रतीक्षा
यदि पनप रही होगी कहीं
तो भी रूकूं कैसे
मुझे लौटने दो
बन बन कर
ताप
उच्छवास
ताकि किसी घनघोर समय में
रच सको
अपनी इच्छा
बेपरवाह।


2
किसी ‘शायद‘ की ओट में
नहीं घेरता भय
क्या जवाब दूँगा
माइक्रान भर कोशिकाओं को
कि लौट आया
बेवजह
प्रश्नों की अंत्येष्टि के बाद
कौन करता होगा तेरहवीं
कौन साल भर
जलाता होगा दीया
अस्थियों के स्वाद से
कितनी इच्छाएं होती होंगी जवाँ
निःशब्द के संसर्ग से ही शायद
जन्म लेती होगी पीड़ा
दुनिया करवट ले
तो बनेगी जगह
फिर लौटने की
रातों को सो सकेंगे देव
बिना खलल
अपने ख्वाब में वे
बेहिचक करें शिकार
लौटते रहेंगे शब्द
सबके सिराहने के पास
बेहिचक
बेवजह।

3
उसकी पसलियों पर
नहीं होता सवेरा
नींद में दूर धकेल देती सूरज
पिंडलियों तक
उभर आती स्वप्न की सतह
पनप रहे होंगे स्पर्श
किसी पुरुष की फुनगी में
झूठ को कहीं सच में
तराश रही होगी इच्छा
सुनो
जब आओ भीतर
तो कुंडी चढ़ा देना
यहाँ उपहार की तरह
नहीं मिलेगी वापसी
जापते रहना
मनके की तरह उम्र
कभी सुनी है तुमने
पुरखों की आवाज
इस माँसल गली में
जिससे नहीं होता लौटना
पड़े रहो चुपचाप
बिस्तर पर
उतार रही होगी देह
मृत्यु
किसी कोने में।

4
मत कहो
कि सिर्फ तुम्हारा है अंधेरा
जहाँ ओस की तरह
फुनगियों पर पड़ी रहती चीख
चींटियों की तरह
कतार में नही आती स्मृतियाँ
बेमानी सा है सच
हड्डियों को हसीन बनाती
एक मिलीमीटर त्वचा
अपने ही स्वप्न में
वीभत्स लगता अपना ही चेहरा
नींद को खून से
अलग करती किडनी
मृत्यु की बेरूखी पर
झल्ला जाते बिस्तर
सफेद परिचारिकाएँ
उतारती बूंद बूंद धोखा
दवा की बू में लिपटी फुसफुसाहट
उड़ती सिराहने के आसपास
अचानक
पंख फैला उड़ जाती पीड़ा
देह के डंगाल से।



5
दोपहर की नींद में
घुटने मोड़कर
लेटी रहती पीड़ा
दीवार की ओर पीठ किये
बूंद बूंद रिसता मन
पसलियों में टीसती प्रतीक्षा
और मुखातिब होता खुद से
नाहक ही बने हैं प्रार्थना
छूटती हरेक कोशिकाओं की गिरफ्त
सभी रतजगी आँखों में
पनियल उबासी
स्पर्श की झुर्रियों को
असमंजस में छोड़
विदा लेता लहू
आत्मा के सूखे होंठ में
निवेदन की कोई बुदबुदाहट नहीं
उम्र की आँच में
वाष्पित होते जीवद्रव्य
उड़ चलते दूर देश
देह का संस्कार
बचा रहेगा अंतिम परासरण तक
नींद की दोपहर में
आराम फरमाती स्मृतियाँ
और स्त्रियाँ
सुन्नत की महक से भरी।

6
एक अधेड़ शब्द ने
दी जगह
मुझे होने की
स्वागत ऐसे ह होता रहे
तो कितना अच्छा हो
कि स्पर्श की तितलियाँ
पसलियों पर घुमड़ती रहे
वह मुस्कुरात है
और मैं
उसे ख्यालों में खींच लाता हूँ
गर्भनाल की कसम
यह सब तुम ही कर रही हो
पीठ पर
क्यों नहीं होती औरतें
इतनी लकधक होगी
माया
तो फिर रोने की दवा लेनी होगी
यह तो वक्षों की शुक्र है
कि वह है
एक अधेड़ कविता ने
दी फुरसत
खोने की।